सुप्रीम कोर्ट में SIR पर कड़ा रुख, कहा- क्या चुनाव आयोग की शक्तियां बेलगाम घोड़े की तरह हैं?

सुप्रीम कोर्ट में SIR पर कड़ा रुख, कहा- क्या चुनाव आयोग की शक्तियां बेलगाम घोड़े की तरह हैं?

 नई दिल्ली/ सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की वैधता और प्रक्रिया पर सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की शक्तियों पर गंभीर सवाल उठाए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाला बागची की पीठ ने कहा कि चुनाव आयोग के पास व्यापक विवेकाधिकार है, लेकिन क्या यह “बेलगाम घोड़े” की तरह अपनी शक्तियों का प्रयोग कर सकता है, जहां कोई नियंत्रण या न्यायिक समीक्षा न होlपीठ ने चुनाव आयोग के वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी से कई कठिन सवाल किए और स्पष्ट किया कि कोई भी शक्ति अनियंत्रित या पूरी तरह से असंयमित नहीं हो सकती। मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, “मतदाता सूची में संशोधन से किसी व्यक्ति के नागरिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं, इसलिए प्रक्रिया प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप, निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए।”न्यायमूर्ति बागची ने जोर दिया कि चुनाव आयोग नियमों से विचलन कर सकता है, लेकिन यह विचलन नहीं हो सकता। उन्होंने कहा, “कोई भी शक्ति बेलगाम नहीं हो सकती। नियम 21 में एक बंधन है – यदि गहन संशोधन हो रहा है, तो नियम 4 से 13 लागू होने चाहिए।”याचिकाकर्ताओं, जिनमें विपक्षी दल और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स शामिल हैं, ने तर्क दिया कि SIR के दौरान चुनाव आयोग अपने नियमों का पालन नहीं कर रहा, अतिरिक्त दस्तावेज मांग रहा है (जैसे फॉर्म 6 में 6 दस्तावेज निर्धारित हैं, लेकिन एसआईआर में 11), और इससे लाखों मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।चुनाव आयोग की ओर से द्विवेदी ने दलील दी कि आरपी एक्ट और संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत आयोग को मतदाता सूची तैयार करने की व्यापक शक्ति है, और SIR “निर्धारित तरीके” से हो रहा है। उन्होंने कहा कि आयोग मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा कर रहा है और अनुच्छेद 326 का उल्लंघन नहीं हो सकता। हालांकि, अदालत ने पूछा कि क्या यह शक्ति न्यायिक समीक्षा से परे है, और प्रक्रिया में निष्पक्षता, तर्कसंगतता व उचित प्रक्रिया अनिवार्य है।यह सुनवाई विभिन्न राज्यों में एसआईआर के खिलाफ दायर याचिकाओं पर हो रही है, जहां याचिकाकर्ता दावा कर रहे हैं कि प्रक्रिया से बड़े पैमाने पर मतदाताओं का बहिष्कार हो सकता है, खासकर गरीब और हाशिए पर रहने वाले वर्गों का। अदालत ने स्पष्ट किया कि SIR जैसी प्रक्रिया में नागरिक अधिकारों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है, इसलिए इसे पूरी तरह से अनियंत्रित नहीं छोड़ा जा सकता।मामले की अगली सुनवाई में और दलीलें सुनने के बाद अदालत फैसला सुनाएगी। यह फैसला मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया और चुनाव आयोग की जवाबदेही पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।