छत्तीसगढ़ी भाषा को अकादमिक पहचान दिलाने वाले दुर्गा प्रसाद पारकर को मिलेगा लाला जगदलपुरी राज्य अलंकरण

छत्तीसगढ़ी भाषा को अकादमिक पहचान दिलाने वाले दुर्गा प्रसाद पारकर को मिलेगा लाला जगदलपुरी राज्य अलंकरण

भिलाई/छत्तीसगढ़ी भाषा, साहित्य और लोक संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित करने वाले वरिष्ठ साहित्यकार दुर्गा प्रसाद पारकर को राज्य सरकार द्वारा प्रतिष्ठित ‘लाला जगदलपुरी राज्य अलंकरण’ से सम्मानित किया जाएगा। राजधानी रायपुर में रविवार को राज्य शासन की ओर से इस सम्मान की घोषणा की गई। 3 नवंबर को राज्योत्सव के समापन समारोह में मुख्य अतिथि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह उन्हें राज्य अलंकरण प्रदान करेंगे।
आंचलिक साहित्य के क्षेत्र में दिया जाने वाला यह प्रतिष्ठित सम्मान दुर्गा प्रसाद पारकर के दशकों के साहित्यिक साधना और मातृभाषा के प्रति समर्पण का सम्मान है। उनकी इस उपलब्धि से छत्तीसगढ़ी साहित्य जगत और भाषा प्रेमियों में हर्ष का माहौल है। पारकर ने छत्तीसगढ़ी भाषा को लोक व्यवहार और बोलचाल की सीमाओं से आगे बढ़ाकर उच्च शिक्षा, शोध और अकादमिक मंचों पर स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
एम.ए. छत्तीसगढ़ी पाठ्यक्रम के प्रवर्तक
दुर्गा प्रसाद पारकर का महत्वपूर्ण योगदान पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर में एम.ए. छत्तीसगढ़ी पाठ्यक्रम प्रारंभ कराने की पहल और प्रयास रहा है। इसी योगदान के चलते उन्हें एम.ए. छत्तीसगढ़ी का प्रवर्तक माना जाता है। उनकी चर्चित औपन्यासिक कृति ‘बहू हाथ के पानी’ को हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग और शहीद महेंद्र कर्मा विश्वविद्यालय, बस्तर के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। यह छत्तीसगढ़ी साहित्य की अकादमिक स्वीकार्यता का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
लोक संस्कृति और जनजीवन के सशक्त रचनाकार
11 मई 1961 को दुर्ग जिले के ग्राम बेलौदी (मालूद) में जन्मे पारकर ने साहित्य की विभिन्न विधाओं में उल्लेखनीय योगदान दिया है। छत्तीसगढ़ के लोकजीवन, सामाजिक संरचना, पारिवारिक संबंधों, लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को उन्होंने अपनी रचनाओं का प्रमुख विषय बनाया है।
लोक संस्कृति पर आधारित उनकी पुस्तकें ‘चिन्हारी’ और ‘जस-जंवारा’ छत्तीसगढ़ की जीवनशैली, लोक आस्था और परंपराओं का सजीव चित्रण करती हैं। उपन्यास विधा में ‘केंवट कुंदरा’, ‘बहू हाथ के पानी’ और ‘दिलासा देवी केवट’ उनकी प्रमुख कृतियां हैं। वहीं नाटक के क्षेत्र में ‘शिवनाथ’, ‘सुकवा’, ‘चंदा’, ‘सोनचिरई’ और ‘सुराजी गांव’ जैसी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने छत्तीसगढ़ी लोक रंगमंच को समृद्ध किया है।
अनुवाद, संपादन और पत्रकारिता में भी योगदान
मौलिक लेखन के साथ पारकर ने हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण कृतियों को छत्तीसगढ़ी भाषा में अनूदित कर भाषायी साहित्यिक आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया है। उन्होंने मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास ‘निर्मला’ और ‘प्रतिज्ञा’ तथा व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की कृतियों का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद किया है।
इसके अलावा ‘लोक मंजरी’, ‘छत्तीसलोक’ और ‘धरोहर’ जैसी पत्रिकाओं के संपादन के माध्यम से उन्होंने नए रचनाकारों को साहित्यिक मंच उपलब्ध कराने और छत्तीसगढ़ी साहित्य के विस्तार में योगदान दिया है।
कई प्रतिष्ठित सम्मानों से हो चुके हैं अलंकृत
पारकर को पूर्व में प्रेम साइमन सम्मान, केयूर भूषण सम्मान और छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग सम्मान सहित कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है। उनकी प्रकाशनाधीन कृतियों में सामाजिक समरसता पर आधारित उपन्यास ‘पांच पसर पानी’, छत्तीसगढ़ी उपन्यास ‘दू बीजा चांउर’ और बालगीत संग्रह ‘संगवारी’ शामिल हैं।
दुर्गा प्रसाद पारकर का साहित्यिक सफर इस बात का प्रमाण है कि मातृभाषा के प्रति समर्पण और निरंतर सृजन से किसी भाषा को नई पहचान और प्रतिष्ठा दिलाई जा सकती है। उन्हें मिलने वाला ‘लाला जगदलपुरी राज्य अलंकरण’ न केवल उनके व्यक्तिगत साहित्यिक योगदान का सम्मान है, बल्कि छत्तीसगढ़ी भाषा, साहित्य और संस्कृति के गौरव को भी नई पहचान देगा।
संपर्क: दुर्गा प्रसाद पारकर
मोबाइल: 98274 70653, 79995 16642