पंडवानी की अमर आवाज़ खामोश, तीजन बाई का निधन
रायपुर/छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की सबसे बुलंद आवाज़ हमेशा के लिए खामोश हो गई। पंडवानी की महान गायिका तीजन बाई का 70 वर्ष की आयु में रायपुर AIIMS में निधन हो गया। वह पिछले कई हफ्तों से गंभीर रूप से बीमार थीं और अस्पताल में भर्ती थीं। आज तड़के करीब 3:15 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर मिलते ही छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश के कला, साहित्य और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई।दुर्ग जिले के गनियारी गांव में वर्ष 1956 में जन्मी तीजन बाई ने अपने अदम्य साहस, संघर्ष और असाधारण प्रतिभा के दम पर पंडवानी को विश्व मंच पर नई पहचान दिलाई। जिस दौर में पंडवानी की कापालिक शैली पर पुरुषों का वर्चस्व माना जाता था, उस समय उन्होंने सामाजिक बंधनों और विरोध की परवाह किए बिना इस शैली को अपनाया और अपनी दमदार प्रस्तुति से इतिहास रच दिया।हाथ में तंबूरा, बुलंद आवाज़, प्रभावशाली अभिनय और महाभारत की कथाओं को जीवंत कर देने वाली उनकी प्रस्तुति ने लाखों लोगों को मंत्रमुग्ध किया। पांच दशकों से अधिक लंबे अपने सफर में उन्होंने भारत के साथ-साथ एशिया, यूरोप और दुनिया के अनेक देशों में पंडवानी का परचम लहराया। उन्होंने न केवल इस लोककला को जीवित रखा, बल्कि नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनीं।लोक कला के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया गया। उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण तथा संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुए। उनकी उपलब्धियां केवल व्यक्तिगत सम्मान नहीं थीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की वैश्विक पहचान का प्रतीक बन गईं।तीजन बाई का निधन भारतीय लोक संस्कृति के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उनकी आवाज़ भले ही आज मौन हो गई हो, लेकिन पंडवानी की हर प्रस्तुति, हर कथा और हर कलाकार में उनका योगदान हमेशा जीवित रहेगा। आने वाली पीढ़ियां उन्हें उस महान लोक कलाकार के रूप में याद रखेंगी, जिसने छत्तीसगढ़ की माटी की सुगंध को पूरी दुनिया तक पहुंचाया।